Qaafiya Bazm-e-Adab

फ़क़त रब का इशारा देखना है
कज़ा को कब बहाना देखना है

दिल में जो था वो प्यारा गया
मेरे दिल का सहारा गया

ईमान अपने बीच के सारे बदल गए
दौलत की बात आई तो रिश्ते बदल गए

शाम है और यार है रूठा हुआ
ज़र्ब पर इक ज़र्ब है ये क्या हुआ

उल्फ़त का कोई ग़म मुझे ढोना भी नहीं है
अब दिल को तेरे वास्ते रोना भी नहीं है

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