Qaafiya Bazm-e-Adab

बात करता नहीं कभी कोई
ये भी क्या दोस्ती हुई कोई

हम ग़रीब लोगों का तो ख़ुदा मुहाफ़िज़ है
कुछ नहीं तुम्हें हासिल ज़ोर आज़माने से

जब चले थे एक थे अब कारवाँ होने लगे
दोस्तों के साथ दुश्मन मेहरबाँ होने लगे

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