Qaafiya Bazm-e-Adab

Apnon Se Apne Zakhm Chhupane Ke Waaste

Abdul Rahman “Shaariq”

अपनों से अपने ज़ख्म छुपाने के वास्ते
हम हँस रहे हैं इनको हँसाने के वास्ते

कैसे हैं वो बताओ कि क़ासिद बजुज तेरे
कोई नहीं है हाल सुनाने के वास्ते

मिस्मार दिल ने सब्र की चादर लपेट ली
अब तो बचे हैं ख़्वाब जलाने के वास्ते

ये सच है हमको हालत-ए-दुनिया से बैर है
सो जी रहे हैं ख़ुद को मिटाने के वास्ते

यूँ तो शदीद ग़म है मेरी ज़ात में मगर
चेहरा सजा रखा है ज़माने के वास्ते

वाबस्तगी से ख़ुद को बचाया है उम्र भर
आवारगी का लुत्फ़ उठाने के वास्ते

अफ़सोस मिल सका न जहाँ भर में एक भी शख़्स
शारिक़ हमारा साथ निभाने के वास्ते

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