Qaafiya Bazm-e-Adab

Sabr Kar, Sabr Ki Ghadi Hai Abhi

Parvez Sheikh

सब्र कर सब्र की घड़ी हैं अभी
इतनी मुश्किल से जो मिली हैं अभी

वक़्त से पहले मौत अच्छी नहीं
जिंदगी सामने पड़ी हैं अभी

आँख रंजूर हो गयी मेरी
उस ने जाने की ज़िद गड़ी हैं अभी

बाद तेरे कोई नहीं होगा
तू मेरी आख़िरी ख़ुशी हैं अभी

तू भी परवेज़ को समझ न सका
तंज़ तेरा भी लाज़मी हैं अभी

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