हम ग़रीब लोगों का तो ख़ुदा मुहाफ़िज़ है
कुछ नहीं तुम्हें हासिल ज़ोर आज़माने से
साथ मिल गए मेरे दोस्त जाके दुश्मन से
क्या मिला मुझे आख़िर दोस्ती निभाने से
मौत की ख़बर सुनकर दौड़ कर चले आना
क़ब्र तक उठा लेना मुझको ग़ुस्लख़ाने से
इम्तिहान ऐसा भी ले लिया था सरवर ने
कौन छोड़ जाता है इक दिया बुझाने से
तितलियाँ टहलती हैं, आज बाग़बाँ दिल है
फूल झड़ रहे होंगे उसके लब हिलाने से
बंद कर लिया मैंने दिल का मेरे दरवाज़ा
अब नहीं खुलेगा ये तेरे खटखटाने से
ये जो मुस्कुराता सर दार पर लटकता है
इश्क़ में अली के है ये ज़बाँ कटाने से