Qaafiya Bazm-e-Adab

बे वफ़ा जब पुकारा गया
उनकी जानिब इशारा गया

ये जुदाई भी कर्ब लाई है
क्या क़यामत तेरी जुदाई है

तकरार में कुछ ऐसे भी लम्हात आ गए
इक बेवफा से मिलने के हालात आ गए

वो जुदाई की घड़ी और सानिहा कैसा लगा
टूट कर बिखरा हुआ इक आईना कैसा लगा

हालाकि दिल से इश्क़ का काँटा निकल गया
लेकिन जो उसका ज़हर था दिल में ही पल गया

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