Qaafiya Bazm-e-Adab

Halaanki dil se ishq ka kaanta nikal gaya

Arif Mahmoodabadi

हालाकि दिल से इश्क़ का काँटा निकल गया
लेकिन जो उसका ज़हर था दिल में ही पल गया

चूँकि वो जान लेवा था जो दर्दे इश्क़ था
परवाना आके ख़ुद से ही शम्मा प जल गया

मुफलिस था जब तलक ओ बड़ा ख़ुश मिजाज़ था
दौलत जो आई पास तो लहजा बदल गया

तिशना लबी ही रखती है क़ाबू में नफ़्स को
मसरूर होते होते ही हद से निकल गया

हारे हुए को कोई नहीं पूछता जनाब
तारीफ़ उसकी होगी जो गिरकर संभल गया

जब से संवारा मैंने है किरदार को मेरे
सारे ही कह रहे हैं कि आरिफ़ बदल गया

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