हालाकि दिल से इश्क़ का काँटा निकल गया
लेकिन जो उसका ज़हर था दिल में ही पल गया
चूँकि वो जान लेवा था जो दर्दे इश्क़ था
परवाना आके ख़ुद से ही शम्मा प जल गया
मुफलिस था जब तलक ओ बड़ा ख़ुश मिजाज़ था
दौलत जो आई पास तो लहजा बदल गया
तिशना लबी ही रखती है क़ाबू में नफ़्स को
मसरूर होते होते ही हद से निकल गया
हारे हुए को कोई नहीं पूछता जनाब
तारीफ़ उसकी होगी जो गिरकर संभल गया
जब से संवारा मैंने है किरदार को मेरे
सारे ही कह रहे हैं कि आरिफ़ बदल गया