वो जुदाई की घड़ी और सानिहा कैसा लगा
टूट कर बिखरा हुआ इक आईना कैसा लगा
हुस्न जो देखा है तूने वो बता कैसा लगा
इश्क़ की तफ़सीर का था सिलसिला कैसा लगा
हुस्न की तस्वीर थी वो या थी वो कोई ग़ज़ल
वो सहर आमेज़ दिल कश दिल रुबा कैसा लगा
बेवफ़ाई कर के तूने दिल को ज़ख़मी कर दिया
तोड़ कर दिल का खिलौना बेवफ़ा कैसा लगा
तुझ को भी ऐ दिल हुआ था उस के आने का यक़ीन
तेरी इस उम्मीद पर पानी फिरा कैसा लगा
दिल से दिल की थी मोहब्बत और न थी कुछ हवस
सच्चे आशिक़ का ये तुझ से राब्त़ा कैसा लगा
तेरे हुस्ने नाज़ को इस ने बनाया है ग़ज़ल
इस अत़ाई की मोहब्बत का सिला कैसा लगा