Qaafiya Bazm-e-Adab

Wo Judai Ki Ghadi Aur Saniha Kaisa Laga

Imran Ataai

वो जुदाई की घड़ी और सानिहा कैसा लगा
टूट कर बिखरा हुआ इक आईना कैसा लगा

हुस्न जो देखा है तूने वो बता कैसा लगा
इश्क़ की तफ़सीर का था सिलसिला कैसा लगा

हुस्न की तस्वीर थी वो या थी वो कोई ग़ज़ल
वो सहर आमेज़ दिल कश दिल रुबा कैसा लगा

बेवफ़ाई कर के तूने दिल को ज़ख़मी कर दिया
तोड़ कर  दिल का खिलौना बेवफ़ा कैसा लगा

तुझ को भी ऐ दिल हुआ था उस के आने का यक़ीन
तेरी इस उम्मीद पर पानी फिरा कैसा लगा

दिल से दिल की थी मोहब्बत और न थी कुछ हवस
सच्चे आशिक़ का ये तुझ से राब्त़ा कैसा लगा

तेरे हुस्ने नाज़ को इस ने बनाया है ग़ज़ल
इस अत़ाई की मोहब्बत का सिला कैसा लगा

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