Qaafiya Bazm-e-Adab

Ye Judai Bhi Karb Laayi Hai

Imran Ataai

ये जुदाई भी कर्ब लाई है
क्या क़यामत तेरी जुदाई है

क्या अजब है कि तेरी अंगड़ाई
मुझ को सजदे में याद आई है

मैं ने ग़ज़लों में लफ्ज़ चुन चुन कर
तेरी तस्वीर इक बनाई है

यूंही छूता नहीं बदन अपना
मेरे अन्दर भी तू समाई है

ग़ैर मुमकिन है हो इलाज इस का
मैं ने अन्दर से चोट खाई है

 

वो जो रहता था खुश मिज़ाजी से
कितना ग़मगीन वो अताई है

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