ये जुदाई भी कर्ब लाई है
क्या क़यामत तेरी जुदाई है
क्या अजब है कि तेरी अंगड़ाई
मुझ को सजदे में याद आई है
मैं ने ग़ज़लों में लफ्ज़ चुन चुन कर
तेरी तस्वीर इक बनाई है
यूंही छूता नहीं बदन अपना
मेरे अन्दर भी तू समाई है
ग़ैर मुमकिन है हो इलाज इस का
मैं ने अन्दर से चोट खाई है
वो जो रहता था खुश मिज़ाजी से
कितना ग़मगीन वो अताई है