Qaafiya Bazm-e-Adab

Ulfat Ka Koi Gham Mujhe Dhona Bhi Nahin Hai

Saif Ahmad Saif

उल्फ़त का कोई ग़म मुझे ढोना भी नहीं है
अब दिल को तेरे वास्ते रोना भी नहीं है

जाना है तुम्हें छोड़ के, तुम शौक से जाओ
बर्बाद मुझे इश्क़ में होना भी नहीं है

औरों को तो देता है जगह पहलू में अपने
मेरे लिए दिल में तेरे कोना भी नहीं है

याँ अक़्ल को कुछ फ़िक्र नहीं है मेरे हमदम
और दिल को तेरी याद में सोना भी नहीं है

यूँ तोड़ के तुम जोड़ते रहते हो मुसलसल
"ये दिल किसी बच्चे का खिलौना भी नहीं है"

ग़ज़लों में बहुत बातें हुई उनकी वफ़ा पर
अल्फ़ाज़ को अब और पिरोना भी नहीं है

 

ये हिज्र मोहब्बत की निशानी है यहाँ पर
मिल जाए तुम्हें सैफ़ तो रोना भी नहीं है

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