Qaafiya Bazm-e-Adab

Shaam Hai Aur Yaar Hai Rootha Hua

Gulam Hussain

शाम है और यार है रूठा हुआ
ज़र्ब पर इक ज़र्ब है ये क्या हुआ

ज़िंदगी के ऐश कैसे झेलता
ज़िंदगी की चोट से उभरा हुआ

रौशनी किस आँख से देखे भला
तीरगी के बहर में डूबा हुआ

देख कर देखा नहीं जब उसने तो
आज अपने ग़म का अंदाज़ा हुआ

सब गिले शिकवे हमारे मिट गए
आज जो देखा उसे रोता हुआ

खूबसूरत रुख़ का रुख़ करते हो फ़ाज़
आपकी आँखों को अब ये क्या हुआ

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