शाम है और यार है रूठा हुआ
ज़र्ब पर इक ज़र्ब है ये क्या हुआ
ज़िंदगी के ऐश कैसे झेलता
ज़िंदगी की चोट से उभरा हुआ
रौशनी किस आँख से देखे भला
तीरगी के बहर में डूबा हुआ
देख कर देखा नहीं जब उसने तो
आज अपने ग़म का अंदाज़ा हुआ
सब गिले शिकवे हमारे मिट गए
आज जो देखा उसे रोता हुआ
खूबसूरत रुख़ का रुख़ करते हो फ़ाज़
आपकी आँखों को अब ये क्या हुआ