Qaafiya Bazm-e-Adab

Faqat Rab Ka Ishara Dekhna Hai

Gulam Hussain

फ़क़त रब का इशारा देखना है
कज़ा को कब बहाना देखना है

दिले मुज़्तर चला है कू-ए-जानां
ग़मों का अब ठिकाना देखना है

जुदाई है मुक़द्दर में अगरचे
हमें भी वो ज़माना देखना है

अभी बाक़ी है कुछ आँखों में हसरत
तेरी जानिब दोबारा देखना है

ख़मोशी बोलती है खिलखिलाकर
तमाशाई तमाशा देखना है

कोई रिश्ता नहीं पर फ़ाज़ उसको
हमेशा मुस्कुराता देखना है

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