फ़क़त रब का इशारा देखना है
कज़ा को कब बहाना देखना है
दिले मुज़्तर चला है कू-ए-जानां
ग़मों का अब ठिकाना देखना है
जुदाई है मुक़द्दर में अगरचे
हमें भी वो ज़माना देखना है
अभी बाक़ी है कुछ आँखों में हसरत
तेरी जानिब दोबारा देखना है
ख़मोशी बोलती है खिलखिलाकर
तमाशाई तमाशा देखना है
कोई रिश्ता नहीं पर फ़ाज़ उसको
हमेशा मुस्कुराता देखना है