ज़माना कहाँ का कहाँ हो गया है
अचानक सभी कुछ धुआँ हो गया है
हक़ीक़त में सब दास्ताँ हो गया है
बज़ाहिर था जो अब निहाँ हो गया है
पड़ा अक्स-ए-महताब छत पे हमारी
तिरा रूप उसमें अयाँ हो गया है
सभी को समझने लगा हूँ मैं दुश्मन
न जाने मुझे क्या गुमाँ हो गया है
हर इक कॉल लगता है तुमने किया है
दिल-ए-मुंतज़िर बदगुमाँ हो गया है
मिली थी मुहब्बत मुझे रास्ते में
कहा मुझसे ऐफ़ी जवाँ हो गया है