Qaafiya Bazm-e-Adab

Zamana Kahan Ka Kahan Ho Gaya Hai

Nirdesh Affy

ज़माना कहाँ का कहाँ हो गया है
अचानक सभी कुछ धुआँ हो गया है

हक़ीक़त में सब दास्ताँ हो गया है
बज़ाहिर था जो अब निहाँ हो गया है

पड़ा अक्स-ए-महताब छत पे हमारी
तिरा रूप उसमें अयाँ हो गया है

सभी को समझने लगा हूँ मैं दुश्मन
न जाने मुझे क्या गुमाँ हो गया है

हर इक कॉल लगता है तुमने किया है
दिल-ए-मुंतज़िर बदगुमाँ हो गया है

मिली थी मुहब्बत मुझे रास्ते में
कहा मुझसे ऐफ़ी जवाँ हो गया है

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