मैं बैठा हूँ कबसे यहाँ और उसको मुझे देखने कि भी फुर्सत नहीं है
चलो मुझको लेकर कही और फिर तुम मिरी जब यहाँ कुछ ज़रूरत नहीं है
में बीमारे दिल था शिफा तुझसे पाई यही इक अदा तेरी मुझको जो भायी
है राहत तेरा देखना मुझको जाना के तुझसा कोई खूबसूरत नहीं है
ज़मीं पे नहीं है जहाँ में नहीं है, गुमाँ में नहीं है कही भी नहीं है
बड़ी सादगी से ये कहता हूँ हमदम तेरे हुस्न सी कोई मूरत नहीं है
जो बोली लगाना है जिसको लगा ले मयस्सर किसी को नहीं होने वाला
में अनमोल हूँ दुनिया वालों कि खातिर तेरे वास्ते कोई कीमत नहीं है
क्यों चुपके से तुम अब मुझे देखते हो ज़रा सामने मेरे आओ कभी तो
मैं तुमको बता दूँगा क्या है मोहब्बत यूँ छुपना छुपाना मोहब्बत नहीं है
वो हर शाम सुनती है ग़ज़लें हमारी यूँ दिल को वो बहलाती नादाँ कुँवारी
वो कहती है मुझसे यूँ नफरत है उसको मगर शायरी से तो नफरत नहीं है
वो हर मोड़ पर इक नई शाम आई जो वादा था कल का कहाँ मिलने आई
यूँ लाज़िम है तुमपे ये गुस्सा हमारा मगर रूठना मेरी आदत नहीं है
बताओ नफीस अब जो था गम तुम्हारा नहीं था क्या तुमको किसी का सहारा
था जो गम मेरा वो सुनाया खुदा को समझ पाओ तुम इतनी हिम्मत नहीं है