Qaafiya Bazm-e-Adab

Wo Chhod Kar Gaya Tha Mujhe Jaise Haal Mein

Ishtiyaque Asar

वो छोड़ कर गया था मुझे जैसे हाल में
अब तक पड़ा हूँ वैसे ही, या'नी मलाल में

बे-रहम उससे ज़्यादा थी दुनिया, लिहाज़ा हम
दानिस्ता आए बार-ए-दिगर उसकी चाल में

दरकार इश्क़ को है मियां उम्र-ए-ना तमाम
ये हाल है तुम्हारा? वो भी एक साल में

होता है गर हसीनों के दिल का कहीं पे ज़िक्र
आते हैं संग ओ खिस्त ही मेरे ख़्याल में

क़सदन ही दिल को तोड़ के कहते हैं मुझसे वो
इक आईना था टूट गया देखभाल में

मुमकिन है रुत खिजां हो जो शक्ल-ए-बहार है
मुमकिन है काँटे भी हों मखमल कि शाल में

ये वजह-ए-शायरी भी है इक माह-ए-ख़ुश-ख़्याल
कोई कमाल ही नहीं मेरे कमाल में

 

तरकीब जा़'ए हो गई मरने की भी असर
देखो वो आया भी नहीं है इंतिक़ाल में

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