वो छोड़ कर गया था मुझे जैसे हाल में
अब तक पड़ा हूँ वैसे ही, या'नी मलाल में
बे-रहम उससे ज़्यादा थी दुनिया, लिहाज़ा हम
दानिस्ता आए बार-ए-दिगर उसकी चाल में
दरकार इश्क़ को है मियां उम्र-ए-ना तमाम
ये हाल है तुम्हारा? वो भी एक साल में
होता है गर हसीनों के दिल का कहीं पे ज़िक्र
आते हैं संग ओ खिस्त ही मेरे ख़्याल में
क़सदन ही दिल को तोड़ के कहते हैं मुझसे वो
इक आईना था टूट गया देखभाल में
मुमकिन है रुत खिजां हो जो शक्ल-ए-बहार है
मुमकिन है काँटे भी हों मखमल कि शाल में
ये वजह-ए-शायरी भी है इक माह-ए-ख़ुश-ख़्याल
कोई कमाल ही नहीं मेरे कमाल में
तरकीब जा़'ए हो गई मरने की भी असर
देखो वो आया भी नहीं है इंतिक़ाल में