फूलों के किसी बाग़ में पत्थर नहीं देखा
नफ़रत है जहां मैने वहां घर नहीं देखा
दावा तो बहुत करता है पर सच तो यही है
मैंने कभी आँखों में तेरी डर नहीं देखा
छोटा ही सही घर ये मेरा सारा जहां हैं
बाहर का कभी मैंने तो मंज़र नहीं देखा
आखिर जो उसे चाहिए मिल सकता था लेकिन
बस उसने मेरे क़ल्ब के अंदर नहीं देखा
चाहूं भी तो बाहर नहीं आ सकती हूं इससे
गहरा है मेरे ग़म का समंदर नहीं देखा
उसने भी सुहानी कभी कोशिश नहीं की फिर
मैंने भी कभी उसको पलटकर नहीं देखा