Qaafiya Bazm-e-Adab

Phoolon Ke Kisi Bagh Mein Patthar Nahin Dekha

Bhagyshree Rajbhar

फूलों के किसी बाग़ में पत्थर नहीं देखा
नफ़रत है जहां मैने वहां घर नहीं देखा

दावा तो बहुत करता है पर सच तो यही है
मैंने कभी आँखों में तेरी डर नहीं देखा

छोटा ही सही घर ये मेरा सारा जहां हैं
बाहर का कभी मैंने तो मंज़र नहीं देखा

आखिर जो उसे चाहिए मिल सकता था लेकिन
बस उसने मेरे क़ल्ब के अंदर नहीं देखा

चाहूं भी तो बाहर नहीं आ सकती हूं इससे
गहरा है मेरे ग़म का समंदर नहीं देखा

उसने भी सुहानी कभी कोशिश नहीं की फिर
मैंने भी कभी उसको पलटकर नहीं देखा

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