Qaafiya Bazm-e-Adab

Nadaniyon Pe Apni Hanse Ja Raha Hoon Main

Saif Dehlvi

नादानियोँ पे अपनी हँसे जा रहा हूँ मैं
काग़ज़ पे तेरा नाम लिखे जा रहा हूँ मैं

शायद वो मुझ को रोक ले बस इतनी आस पे
कहता हूँ बार बार उसे जा रहा हूँ मैं

जाना है किस तरफ़ मुझे मालूम ही नहीं
चलता ही जा रहा हूँ चले जा रहा हूँ मैं

आ देख तेरे हिज्र ने क्या हाल कर दिया
रोने की बात पर भी हँसे जा रहा हूँ मैं

क्यूँ ज़िन्दगी गुज़ार रहा हूँ तिरे बग़ैर
क्यूँ इस ज़मीं पे बोझ बने जा रहा हूँ मै

दिवार पे लिखे हुए अल्फ़ाज़ की तरह
औराक़ ए ज़िन्दगी से मिटे जा रहा हूँ मैं

आबाद ज़िन्दगी तो मुझे कर नहीं सकी
बर्बाद ज़िन्दगी को किये जा रहा हूँ मैं

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