Qaafiya Bazm-e-Adab

Mujhe pata hai aankhen ro-ro kar thak gayi hain

Nafis Alam Shaikh

मुझे पता है ​आंखें रो-रो कर थक गई हैं
​फूलों से हाथ खुदा से सवाल करते हैं
​वो कहां गया जिसने मुझे
इंतज़ार करने को कहा था

​मुझे पता है
​वो बर्तन धोकर जब तन्हा बैठती है
​तो यही सोचती है, हां यही सोचती है
​कि कब मैं उसके कंधे पर अपना सर रख पाऊंगी

​मुझे पता है
​उसका बाप तस्वीरें दिखाते दिखाते थक चुका होगा

​मुझे पता है
​वो किसी और की याद में रोते-रोते सो गई होगी

​मुझे पता है
​वो मंदिर में दीये जला-जला कर ​अपने हाथ जला चुकी है
इस उम्मीद में ​कि इक दिन उसकी ज़िंदगी किसी के आने से रोशन होगी

​मुझे पता है
​एक लड़की बकरियां चराते हुए
​बस यही सोचती होगी
​कि उसका महबूब कब लौट कर आएगा ​जो कह कर गया था
​“मैं जल्द वापस आऊंगा”

​मुझे पता है
​वो रात भर आसमान देखते हुए जागती होगी
​जो कभी ईशा पढ़कर सो जाया करती थी

​मुझे पता है
​वो हसीन गरीब लड़की
​मांगते हुए जब किसी हंसते हुए जोड़े को देखती है
​तो यही सोचती है
​कौन मुझसे शादी करेगा?
कौन मोहब्बत से मेरा हाथ थामेगा ​और मुझसे पूछेगा
​“तुम क्या खाओगी?”

​मुझे पता है
​एक ज़ईफ़ बाप सजदे में यही सोचता है
​कि मैं कैसे बेटी के ससुराल की मांगें पूरी करूं

​मुझे पता है
लड़का दरिया किनारे बैठ कर नुसरत को सुनता है
​हाथ में सिगरेट जलाई इसी उम्मीद से रखता है
​कि उसकी उम्र कम हो जाए

​मुझे पता है
लड़का ये भी सोचता है
​कि उसका महबूब जहां भी हो,
​खुदा की अमान में हो
​वो सोचता है
​कि इक दिन ये दुनिया उनकी मोहब्बत कुबूल कर लेगी
​कितना मासूम सोचता है…

​मुझे पता है
​एक शायर ने बस इसलिए शायरी छोड़ दी थी
​कि उसकी महबूबा अब किसी और की बीवी बन चुकी है
​हां, उसने अपनी आखिरी ग़ज़ल उसके नाम पर लिख कर
​अपनी कलम तोड़ दी थी

​मुझे पता है
​तुम्हें मोहब्बत से बेहद नफरत है

​मुझे पता है
​तुम जौन को पढ़ती हो

​मुझे पता है
​वो रोज़ इसलिए शाम पांच बजे बाग में जाता है

​कि उससे किसी ने कहा था
​“मैं आऊंगी, मेरा इंतज़ार करना”

​और तुझे क्या पता
​तुझे क्या

​तू जिसके लिए अपनी ज़िंदगी बर्बाद कर चुकी है
​वो शख्स तेरा मज़ाक बनाता है
​तेरे दर्द पे हंसता है, मुस्कुराता है

​मुझे पता है
​इश्क ने नस्लें बर्बाद की हैं

​मुझे पता है
​कि इश्क बहुत हसीन है

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