Qaafiya Bazm-e-Adab

Maa Ko Itna Hi Qissa Sunaya Gaya

Uday Divakar

एक ठोकर लगी साँवली चोट है
माँ को इतना ही क़िस्सा सुनाया गया
डीह पूजे गये जल चढ़ाये गए
गाँव में एक दीपक जलाया गया

एक बचपन सँवारा गया इस तरह
जैसे मड़ई में रानी सँवारी गयी
जब कभी भूख से मन ये व्याकुल हुआ
एक आटे की चिड़िया थमाई गई

माँ के क़िस्सों में राजा रहे राम जी
और सीता को घर से निकाला गया

माँ ने पढ़ने को भेजा शहर उस घड़ी
जब ग़रीबी के गहरे कई चोट थे
डेहरी में था गेहूँ सवा मन बचा
और बटुवे में दस के फटे नोट थे

माँ के कानों के झुमके निकाले गये
कुछ किताबों का बस्ता सजाया गया

एक बुढ़िया सिसकती चली भोर में
एक लाठी पुरानी लिए हाथ में
एक उम्मीद बेटा बुलाएगा फिर
माड़ संग भात खाएगी फिर साथ में

रात माँ का बिछौना गया खाट से
आज तकिया भी सर से हटाया गया

एक ठोकर लगी साँवली चोट है
माँ को इतना ही क़िस्सा सुनाया गया

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