एक ठोकर लगी साँवली चोट है
माँ को इतना ही क़िस्सा सुनाया गया
डीह पूजे गये जल चढ़ाये गए
गाँव में एक दीपक जलाया गया
एक बचपन सँवारा गया इस तरह
जैसे मड़ई में रानी सँवारी गयी
जब कभी भूख से मन ये व्याकुल हुआ
एक आटे की चिड़िया थमाई गई
माँ के क़िस्सों में राजा रहे राम जी
और सीता को घर से निकाला गया
माँ ने पढ़ने को भेजा शहर उस घड़ी
जब ग़रीबी के गहरे कई चोट थे
डेहरी में था गेहूँ सवा मन बचा
और बटुवे में दस के फटे नोट थे
माँ के कानों के झुमके निकाले गये
कुछ किताबों का बस्ता सजाया गया
एक बुढ़िया सिसकती चली भोर में
एक लाठी पुरानी लिए हाथ में
एक उम्मीद बेटा बुलाएगा फिर
माड़ संग भात खाएगी फिर साथ में
रात माँ का बिछौना गया खाट से
आज तकिया भी सर से हटाया गया
एक ठोकर लगी साँवली चोट है
माँ को इतना ही क़िस्सा सुनाया गया