किसे मालूम वो बूढ़ी अजब सदमे में रहती है
पलट कर आएगा बेटा इसी जज़्बे में रहती है
चुनी थी राह बेटे ने निकल कर घर से जाते जो
तभी से उसकी आँखें बस उसी रस्ते में रहती है
कभी तो भूल जाती है अकेले मुस्कुराती है
समझती है कि बेटा है उसी लम्हे में रहती है
रखी है ठोकरों में शान-ओ-शौकत उसने दुनिया की
बड़े आराम से बेख़ौफ़ वो मलबे में रहती है
दुआएँ माँगती है लौटने की इल्तिजा करती
कई घंटों तलक ‘सरदार’ बस सजदे में रहती है