Qaafiya Bazm-e-Adab

Kise maloom woh boodhi ajab sadme mein rehti hai

Sardar Ali Sayed

किसे मालूम वो बूढ़ी अजब सदमे में रहती है
पलट कर आएगा बेटा इसी जज़्बे में रहती है

चुनी थी राह बेटे ने निकल कर घर से जाते जो
तभी से उसकी आँखें बस उसी रस्ते में रहती है

कभी तो भूल जाती है अकेले मुस्कुराती है
समझती है कि बेटा है उसी लम्हे में रहती है

रखी है ठोकरों में शान-ओ-शौकत उसने दुनिया की
बड़े आराम से बेख़ौफ़ वो मलबे में रहती है

दुआएँ माँगती है लौटने की इल्तिजा करती
कई घंटों तलक ‘सरदार’ बस सजदे में रहती है

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