Qaafiya Bazm-e-Adab

Deti Hai Meri Aql Mere Dil Ko Dilasa

Usman Akbar

देती है मिरी अक़्ल मिरे दिल को दिलासा
मिल जाएगा फिर दूसरा चेहरा भी शनासा

है अक़्ल परेशान तो मायूस है दिल भी
लगने लगा अपना ही मुझे चेहरा बुरा सा

पानी की जगह कोई उसे ज़हर न दे दे
बरसों से रहा क़ैद में बेचारा वो प्यासा

हो जाएंगे दिन दूर परेशानी के और फिर
तुम देखना एक रोज पलट जाएगा पासा

हर दर पे मैं क्यों जाता नहीं उसका सबब है
हर दर मुझे लगता ही नहीं मेरे खुदा सा

 

अशआर सुनें मेरे तो कहने लगे शा'इर
उस्मान हमें लगता है दिल तेरा जला सा

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