Qaafiya Bazm-e-Adab

Tujh Pe Agar Ilzaam Nahin Hai

Bhagyshree Rajbhar

तुझ पे अगर इल्ज़ाम नहीं है
इश्क़ में तेरा काम नहीं है

वो चाहे गुलफाम नहीं है
खास है फिर भी आम नहीं है

उसकी मर्ज़ी कब तक ठहरे
दिल का कोई दाम नहीं है

जिसमें तड़पा न हो ये दिल
ऐसी कोई शाम नहीं है

मैं जिंदा हूं अब तक कैसे
इश्क़ का ये अंजाम नहीं है

सब कुछ मेरे पास है लेकिन
दिल को क्यूँ आराम नहीं है

 

हर वो कहानी झूठी है बस
जिस में तेरा नाम नहीं है

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