Qaafiya Bazm-e-Adab

Tere Deewane Ke Sar Waise Hain Ilzaam Bahut

Ishtiyaque Asar

तेरे दीवाने के सर वैसे हैं इल्ज़ाम बहुत
उनमें ये ख़ास कि लेता है तेरा नाम बहुत

मुझको है याद बहलते थे तुम इससे अक्सर
दिल है मेरा मगर आया है तेरे काम बहुत

दिल है दाना मेरा माइल न हुआ बार-ए-दिगर
वर्ना आते हैं हसीनाओं के पैग़ाम बहुत

ज़ख्म तो सबने लगाए हैं चलो तुम भी सही
वैसे भी दिल में हैं मेरे ग़म ओ आलाम बहुत

उनको अब याद नहीं है 'असर' उस कूचे में
पहले मैं जाता तो आते थे सर ए बाम बहुत

हाय उनके लब ए नाज़ुक वो महरबां बाहें
याद आती है कोई शाम सर ए शाम बहुत

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