Qaafiya Bazm-e-Adab

Saath De Den Wo Gar Khushi Ke Saath

Saif Ahmad Saif

साथ दे दें वो गर खुशी के साथ
उम्र गुज़रेगी फिर उन्हीं के साथ

चार कांधों पे जा के बतलाया
ऐसे जाते हैं खामोशी के साथ

कैसी गुज़री तुम्हारी वो रातें
जो गुज़ारी गईं किसी के साथ

घर का हँसमुख शरारती लड़का
अब छुपाता है ग़म, हँसी के साथ

आज घर बाँट लेते हैं भाई
बाँटते थे जो दुख ख़ुशी के साथ

वक़्त ठहरा हुआ है लेकिन मैं
चल रहा हूँ मेरी घड़ी के साथ

वो जनाज़े में साथ चलते हैं
जो न चल पाए ज़िंदगी के साथ

 

सैफ ग़ज़लें खरीद कर पढ़ना
क्या तमाशा है शायरी के साथ

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