पुराने ख़त जलाए जा रहे हैं
निशान-ए-ग़म मिटाए जा रहे हैं
अँधेरी रात ने हर सू है घेरा
मगर वो याद आए जा रहे हैं
नसीबों में नहीं है रौशनी पर
दिए फिर भी जलाए जा रहे हैं
बढ़ी हैं दूरियाँ पर दिल के अंदर
पुराने हक़ जताए जा रहे हैं
हक़ीक़त में नहीं है जो मयस्सर
वही दिल में बसाए जा रहे हैं
मुसाफ़िर हैं मगर हर रास्ते पर
नया इक घर बनाए जा रहे हैं
जो कहना था कभी तन्हाइयों से
वो महफ़िल में सुनाए जा रहे हैं