फूलों की चाहत में काँटों का डर कैसा
अंजाम का ख़ौफ़ हो तो सफर कैसा
घर की जन्नत जिससे संभाली नहीं जाती
फिर जन्नत में उसके लिए घर कैसा
मछलियों को भी पसीने आने लगे हैं
हो रहा है समंदर में ये असर कैसा
गालियों पे तालियां बटोरी जा रही हैं
है आज के इस दौर का हुनर कैसा