Qaafiya Bazm-e-Adab

Phoolon Ki Chahat Mein Kaanton Ka Dar Kaisa

Irfan Tarique Khan

फूलों की चाहत में काँटों का डर कैसा
अंजाम का ख़ौफ़ हो तो सफर कैसा

घर की जन्नत जिससे संभाली नहीं जाती
फिर जन्नत में उसके लिए घर कैसा

मछलियों को भी पसीने आने लगे हैं
हो रहा है समंदर में ये असर कैसा

गालियों पे तालियां बटोरी जा रही हैं
है आज के इस दौर का हुनर कैसा

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