Qaafiya Bazm-e-Adab

Nigah-e-Yaar Ka Hai Ye Khumaar Aankhon Mein

Gulam Hussain

निगाह-ए-यार का है ये ख़ुमार आँखों में
के फिर रहा है कोई लाला-ज़ार आँखों में

नज़र जो आए वो दिल-कश वो ख़ूब-रू पैकर
क़रार आए कहीं बे-क़रार आँखों में

क़सम ख़ुदा की यही आख़िरी तमन्ना है
के देखता रहूँ रुख़ की बहार आँखों में

यूँ ढूँढती हैं ये आँखें बहार को जैसे
किसी निगार का हो इंतज़ार आँखों में

खुली हों, बंद हों आँखें, तेरा ही चेहरा है
जहाँ भी देखूँ है तू आश्कार आँखों में

न ज़िक्र छेड़ किसी दूसरे ठिकाने का
बसा हुआ है अभी कू-ए-यार आँखों में

दर-ए-हुज़ूर की फ़ुर्क़त हमें रुलाती है
रवाँ हैं अश्क जो बे-इख़्तियार आँखों में

क़ुबूल कर लें जो चश्म-ए-करम में अपनी वो
इसी जहाँ में हो दीदार-ए-यार आँखों में

नज़र जो देख ले जलवा सवालों से पहले
जवाब होंगे सभी आश्कार आँखों में

न होगा ख़ौफ़-ए-नज़ा, वहशत-ए-लहद कुछ 'फ़ाज़'
रहे जो हश्र तलक रू-ए-यार आँखों में

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