Qaafiya Bazm-e-Adab

Na Lautenge Bata Kar Aa Rahe Hain

Hemant Sharma

न लौटेंगे बता कर आ रहे हैं
मोहब्बत के सफर पर जा रहे हैं

कोई मन्नत का धागा तोड़ कर हम
तो कोई बाँध कर पछता रहे हैं

ये बढ़ती दूरियों से है ब-ज़ाहिर
कि हम नज़दीकियों को ढा रहे हैं

समेटी हमने दामन में ये दुनिया
मगर सपने बिखरते जा रहे हैं

पता तो है कि तुम भी बेवफ़ा हो
मगर हम दिल को बस बहला रहे हैं

हमें रोना नहीं आता ये सुनकर
हमारे यार हँसते जा रहे हैं

सुना है तुम हमें फिर से मिलोगे
नई एक उम्र लेने जा रहे हैं

जो कहते थे कि शायर नहीं हूँ
मेरी ग़ज़लों को अब वो गा रहे हैं

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