लगने वाले हैं बुरे वक़्त ठिकाने मेरे
मुझको बेटी से नवाज़ा है ख़ुदा ने मेरे
आप तो फिर भी हैं कुछ नर्म कई पत्थर दिल
रो पड़े सुनके मुहब्बत के फ़साने मेरे
है मसीहा की ज़रूरत ना दवा की मुझको
जबसे बैठा है कोई आ के सिरहाने मेरे
जब रहा साथ किसी ने भी कोई क़द्र ना की
ढूंढते फिरते हैं अब लोग ठिकाने मेरे
दिल भी अब करता नहीं घर से निकलने का मेरा
जबसे कम मिलने लगे दोस्त पुराने मेरे
कौन परदेस में होता है किसी का 'हैदर'
कौन आएगा यहाँ नाज़ उठाने मेरे