Qaafiya Bazm-e-Adab

Mujh Sa Koi Halaat Ka Maara Bhi Nahin Tha

Saif Dehlvi

मुझ सा कोई हालात का मारा भी नहीं था
पर मैं कभी हालात से हारा भी नहीं था

ग़ैरो से गिला क्या ही करें वक्त ए मुसीबत
हम को किसी अपने का सहारा भी नहीं था

फ़िर क्यूँ मुझे मिल पाया नहीं हक़ मेरा या रब
हक़ मैंने किसी का कभी मारा भी नहीं था

ये उसका करम है कि निकल आये हैं बाहर
वरना हमें तिनके का सहारा भी नहीं था

फ़िर क्यूँ मिरे कानोँ में सदा आती थी उसकी
उस ने तो कभी मुझ को पुकारा भी नहीं था

क्या करता अगर हिंदू मुसलमान न करता
कुर्सी के लिए और कोई चारा भी नहीं था

 

सैफ़ अहल ए मोहब्बत ने बताया तुम्हें जितना
इतना तो मोहब्बत में ख़सारा भी नहीं था

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