मुझ सा कोई हालात का मारा भी नहीं था
पर मैं कभी हालात से हारा भी नहीं था
ग़ैरो से गिला क्या ही करें वक्त ए मुसीबत
हम को किसी अपने का सहारा भी नहीं था
फ़िर क्यूँ मुझे मिल पाया नहीं हक़ मेरा या रब
हक़ मैंने किसी का कभी मारा भी नहीं था
ये उसका करम है कि निकल आये हैं बाहर
वरना हमें तिनके का सहारा भी नहीं था
फ़िर क्यूँ मिरे कानोँ में सदा आती थी उसकी
उस ने तो कभी मुझ को पुकारा भी नहीं था
क्या करता अगर हिंदू मुसलमान न करता
कुर्सी के लिए और कोई चारा भी नहीं था
सैफ़ अहल ए मोहब्बत ने बताया तुम्हें जितना
इतना तो मोहब्बत में ख़सारा भी नहीं था