महब्बत में ख़सारा चल रहा है
हमारा बस गुज़ारा चल रहा है
भँवर में प्रेम के लगता है ऐसे
नदी का बस किनारा चल रहा है
न बुझती है न पूरी जल रही है
चरागों में शरारा चल रहा है
उसे हम जीत कर भी हार बैठे
अजब ये खेल सारा चल रहा है
न मांझी है न कोई साथ अपने
दुआओं से शिकारा चल रहा है
थकी आँखों को अब कैसे सुलाएँ
फलक पर एक सितारा चल रहा है
वो मज़बूरी कहें या ख़ुद-फ़रेबी
बिना उनके गुज़ारा चल रहा है
वही मुंसिफ़, अदालत भी उसी की
मुक़दमा बस हमारा चल रहा है