मेरी इन आँखों में नमी न होती
जो दूर तुझसे मैं कभी न होती
गर तुम कहीं निभाना सीख जाते
इस ज़िन्दगी में कोई कमी न होती
थी ख्यालों में भी इश्क़ की ही बातें
तन्हाई में यूँ शायरी न होती
हम घर पे वक्त से जो आते जाते
यूँ बंद घर की ये घड़ी न होती
फिर तेरे ही लिए मैं खाब बुनती
फिर ऐसे ख्वाहिशें थमी न होती
होती वफ़ा जो तेरी तर्बियत में
ज़ाया यूँ मेरी आशिक़ी न होती