मस्जिद व मंदिर न कोई देवता दरकार है
ग़म के मारे आशिक़ों को मैकदा दरकार है
मैं हूँ तन्हाई है और बे-कैफ़ यादें हैं तेरी
बे-मज़ा इस ज़िंदगी को और क्या दरकार है
इन हवाओं का तकब्बुर चूर करने के लिए
अज़्म हो जिसका बड़ा ऐसा दिया दरकार है
पस्त होते हैं बहादुर इश्क़ के मैदान में
दिल लगाने के लिए भी हौसला दरकार है
आप को गर चाँद से तश्बीह देना हो मुझे
तो ग़ज़ल में बेमिसाली क़ाफ़िया दरकार है
जाम व मीना से तो मैं मदहोश होने से रहा
तेरी इन मख़मूर आँखों का नशा दरकार है
मैं नहीं कहता कि ख़ालिस सैफ़ का हो जा सनम
मुझ को पूरा होने में बस तू ज़रा दरकार है