Qaafiya Bazm-e-Adab

Mas’ala Ye Hai Wo Marham To Laga Deta Hai

Abdul Rahman “Shaariq”

मसअला ये है वो मरहम तो लगा देता है
लेकिन ऐैसे कि मेरा दर्द बढ़ा देता है

साँस लेना बड़ा दुश्वार है दौराने-फ़िराक़
दो घड़ी का ये सफ़र मुझ को थका देता है

अश्क बहते हैं तो कहता है कि ये ज़ेब नहीं
और फिर ऐसे ही हालात बना देता है

उस को शायद इसी हालत में हसीं लगता हूँ
सो वो कुछ ग़म मेरे चेहरे पे सजा देता है

इन सहारों से यही तजुर्बा हासिल हुआ दोस्त
जो हँसाता है वो इक रोज़ रुला देता है

मैं तो बस हाथ उठा सकता हूँ लेकिन शारिक़
मातम-ए-इश्क़ की तौफ़ीक़ ख़ुदा देता है

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