Qaafiya Bazm-e-Adab

Koi Jami Yahan Nahin Rehta

Mohammad Zami Ansari

तू जहाँ है वहाँ बहारें हैं
और ख़ुशियों का आना जाना है
मेरा कमरा है क़ैदख़ाना इक
और उदासी का आना जाना है

चीखती है जहाँ पे ख़ामोशी
ऐसी तन्हाई मुझको भाती है
उसको हिचकी भले ही ना आए
याद उसकी बहुत ही आती है

मेरे कमरे की चारों दीवारें
मुझपे हसती हैं ताने देती हैं
कान आते नहीं नज़र इनके
ना मुझे कुछ सुनाने देती हैं

मेरे आँसू यूँही नहीं टपके
उसकी यादों का भी है ग़म मुझ पर
बिगड़ी हालत मेरी सुधर जाए
एक नज़र डालिए सनम मुझ पर

रख के इंसाफ के तराज़ू पर
सबके अलफ़ाज़ तोल देता हूँ
खटखटाता है कोई दरवाज़ा
जल्दबाज़ी में खोल देता हूँ
कोई जामी यहाँ नहीं रहता
सबके मुँह पे मैं बोल देता हूँ

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