कोई भी कैसा भी चल रहा है
निज़ाम-ए-दुनिया बदल रहा है
शदीद गर्मी है अब फ़िज़ा में
हिमालया भी पिघल रहा है
ख़ुशी में सबकी था ख़ुश वो पहले
न जाने क्यों अब वो जल रहा है
पहल के चक्कर में दोस्त अपना
गिरा के आगे निकल रहा है
है ज़ोर-ए-ज़ालिम जहाँ में ऐसा
ग़रीब हर दिन कुचल रहा है
थी सर पे पहले हया की चादर
और अब दुपट्टा फिसल रहा है