Qaafiya Bazm-e-Adab

Koi Bhi Kaisa Bhi Chal Raha Hai

Sardar Ali Sayed

कोई भी कैसा भी चल रहा है
निज़ाम-ए-दुनिया बदल रहा है

शदीद गर्मी है अब फ़िज़ा में
हिमालया भी पिघल रहा है

ख़ुशी में सबकी था ख़ुश वो पहले
न जाने क्यों अब वो जल रहा है

पहल के चक्कर में दोस्त अपना
गिरा के आगे निकल रहा है

है ज़ोर-ए-ज़ालिम जहाँ में ऐसा
ग़रीब हर दिन कुचल रहा है

थी सर पे पहले हया की चादर
और अब दुपट्टा फिसल रहा है

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