Qaafiya Bazm-e-Adab

Kal raat khwahishon ka byopaar ho gaya tha

Uday Divakar

कल रात ख़्वाहिशों का ब्योपार हो गया था
इस पार था जो हमदम उस पार हो गया था

पहले पहल तो उस की नज़रों में इक चुभन थी
जब बार बार देखा तो प्यार हो गया था

जब तक पढ़ा गया मैं तब तक वुजूद मेरा
सब के लिए मैं कल का अख़बार हो गया था

उस की वफ़ा में पल पल था क़त्ल का इरादा
इस बार बच गया मैं उस बार हो गया था

मत पूछ किस जतन से कैसे वो शब ढली जब
माह-ए-तमाम उन का दीदार हो गया था

देखो 'उदय' ने जल कर बस्ती उजाड़ डाली
बुझता चराग़ कितना लाचार हो गया था

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