Qaafiya Bazm-e-Adab

Hamein Khwaabon Ko Palkon Par Sajana Hi Nahin Aaya

Hemant Sharma

हमें ख़्वाबों को पलकों पर सजाना ही नहीं आया
मुहब्बत का कोई रिश्ता निभाना ही नहीं आया

बिछड़ते वक़्त देखा ही नहीं तुमने हमें मुड़कर
हमें भी हाथ हसरत से उठाना ही नहीं आया

हमारे ज़र्फ़ ने हमको इजाज़त ही नहीं बख़्शी
तो दिल का हाल चेहरे से जताना ही नहीं आया

लगा कर आग बस्ती में वो ख़ुद मातम मनाते हैं
मगर जलते हुए घर को बचाना ही नहीं आया

खुलेंगे राज़ क्या उन पर हमारी बे ज़ुबानी के
जो रूठे हैं अगर उनको मनाना ही नहीं आया

जिन्हें मंज़िल मिली उनको किसी भटके मुसाफ़िर को
सलीक़े से कभी रस्ता दिखाना ही नहीं आया

यही कोशिश रही अपनी कि तुमको भूल जाएं हम
मगर कुछ यूँ हुआ तुमको भुलाना ही नहीं आया

ग़ुरूर-ए-इश्क़ ने पत्थर बना डाला है अब हमको
किसी के सामने दामन बिछाना ही नहीं आया

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