हमें ख़्वाबों को पलकों पर सजाना ही नहीं आया
मुहब्बत का कोई रिश्ता निभाना ही नहीं आया
बिछड़ते वक़्त देखा ही नहीं तुमने हमें मुड़कर
हमें भी हाथ हसरत से उठाना ही नहीं आया
हमारे ज़र्फ़ ने हमको इजाज़त ही नहीं बख़्शी
तो दिल का हाल चेहरे से जताना ही नहीं आया
लगा कर आग बस्ती में वो ख़ुद मातम मनाते हैं
मगर जलते हुए घर को बचाना ही नहीं आया
खुलेंगे राज़ क्या उन पर हमारी बे ज़ुबानी के
जो रूठे हैं अगर उनको मनाना ही नहीं आया
जिन्हें मंज़िल मिली उनको किसी भटके मुसाफ़िर को
सलीक़े से कभी रस्ता दिखाना ही नहीं आया
यही कोशिश रही अपनी कि तुमको भूल जाएं हम
मगर कुछ यूँ हुआ तुमको भुलाना ही नहीं आया
ग़ुरूर-ए-इश्क़ ने पत्थर बना डाला है अब हमको
किसी के सामने दामन बिछाना ही नहीं आया