Qaafiya Bazm-e-Adab

Gaye Saawan Nahin Laute Nadi Waisi Ki Waisi Hai

Yashpal Singh

गए सावन नहीं लौटे नदी वैसी की वैसी है
कि तेरे बाद भी तेरी कमी वैसी की वैसी है

वही इक रोज़ जब मिलकर कहा था ‘फिर मिलें शायद’
वहीं अटकी हुई है ज़िंदगी वैसी की वैसी है

सभी से मिल रहे हैं हम ,बसर भी कर रहे हैं हम
मगर जो टीस है दिल में दबी वैसी की वैसी है

गए दफ़्तर लिए खाना, रहे मसरूफ़ रोज़ाना
निगाहों में मगर जानाँ, नमी वैसी की वैसी है

हटा दी हैं सभी चीज़े मगर कमरे की वो ड्रेसिंग
लगी जिस पर तिरी बिंदी अभी वैसी की वैसी है

नये साथी, नये क़िस्से, नई दुनिया, नई राहें
नई सड़कें बनी लेकिन गली वैसी की वैसी है

नहीं मरते किसी के बिन, यही बस सोच कर हर दिन
ये कांटे चल पड़े लेकिन, घड़ी वैसी की वैसी है

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