गए सावन नहीं लौटे नदी वैसी की वैसी है
कि तेरे बाद भी तेरी कमी वैसी की वैसी है
वही इक रोज़ जब मिलकर कहा था ‘फिर मिलें शायद’
वहीं अटकी हुई है ज़िंदगी वैसी की वैसी है
सभी से मिल रहे हैं हम ,बसर भी कर रहे हैं हम
मगर जो टीस है दिल में दबी वैसी की वैसी है
गए दफ़्तर लिए खाना, रहे मसरूफ़ रोज़ाना
निगाहों में मगर जानाँ, नमी वैसी की वैसी है
हटा दी हैं सभी चीज़े मगर कमरे की वो ड्रेसिंग
लगी जिस पर तिरी बिंदी अभी वैसी की वैसी है
नये साथी, नये क़िस्से, नई दुनिया, नई राहें
नई सड़कें बनी लेकिन गली वैसी की वैसी है
नहीं मरते किसी के बिन, यही बस सोच कर हर दिन
ये कांटे चल पड़े लेकिन, घड़ी वैसी की वैसी है