Qaafiya Bazm-e-Adab

Dil-e-Muztar Ko Rakhta Hai Koi Aafaat Ke Andar

Abdul Rahman “Shaariq”

दिल-ए-मुज़्तर को रखता है कोई आफ़ात के अंदर
उदासी रक़्स करती है हमारी ज़ात के अंदर

सो अब महसूस होता है ज़रूरी है दुआ माँ की
कोई मुश्किल-कुशा तो हो बुरे हालात के अंदर

तुम्हारी याद की हल्की सी आहट भी अजब शै है
मचल उठते हैं हम जैसे दबे जज़्बात के अंदर

कभी जब आँख लगते ही तुम्हारा ख़्वाब आता है
उजाला फैल जाता है अंधेरी रात के अंदर

तुम्हारे साथ गुज़रे हैं वो अच्छे वक़्त जितने भी
अभी तक खोए बैठे हैं उन्हीं लम्हात के अंदर

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