Qaafiya Bazm-e-Adab

Barish Mein Bekhauf Nahaye Kitne Arse Beet Gaye

Sardar Ali Sayed

बारिश में बेख़ौफ़ नहाए कितने अरसे बीत गए
काग़ज़ की इक नाव बनाए कितने अरसे बीत गए

बचपन में माँ के हाथों से खाना खाने मिलता था
उन हाथों से खाना खाए कितने अरसे बीत गए

मिलते थे हर रोज़ सभी हम घूमने जाया करते थे
यारों की महफ़िल को सजाए कितने अरसे बीत गए

अब तो इक लड़की मिलना भी कितना मुश्किल लगता है
इक साथ अब दो-चार पटाए कितने अरसे बीत गए

 

ख़ूब मज़ा आता था पहले, बहनें थीं जब मायके में
बहनों को सरदार सताए कितने अरसे बीत गए

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