बातें थीं राज़ की सर-ए-बाज़ार कर गए
पर सामने जब आए तो इनकार कर गए
मदहोशियों में मेरी था संभालना जिन्हें
पर जाम के वो प्याले भी तैयार कर गए
तनहाइयाँ थीं पास रहा ना कोई सुकूं
यादों की आग देके वो बीमार कर गए
सोचा था मैंने होगा नहीं उनसे फिर मिलन
पर सामने वो आए गुनहगार कर गए
कोई चराग़ वादों का फिर जल नहीं सका
दिखला के ख़्वाब हमको वो बेदार कर गए
उल्फ़त है उनसे हमको कोई शक नहीं मगर
हमसे खता हुई कि हम इज़हार कर गए
देकर के ज़ख़्म हमको तो मरहम नहीं दिया
ऐसे भी लोग कुछ हमें बीमार कर गए
सोचे थे हम कि साथ बनाएंगे कोई घर
दे कर हमे दगा जो कि मिसमार कर गए
देखे जो उनको कोई "मुहंदिस" कहे ग़ज़ल
नादान पेश चंद एक अश-आर कर गए