अपनी अना को कुछ यूं जलाना पड़ा मुझे
हस्ती को अपनी खुद ही मिटाना पड़ा मुझे
हाँ रात ने अंधेरे को जब गहरा कर लिया
तब रुख से तेरे परदा उठाना पड़ा मुझे
देखा जो तेरा हुस्न तो मदहोश हो गया
देके करेंट होश में लाना पड़ा मुझे
क्यों आंख वाले गड्ढे में गिर जाते है भला
उस अंधे को ये दृश्य दिखाना पड़ा मुझे
देकर कसम वो तेरी सनम पूछने लगा
जो था अहम वो राज बताना पड़ा मुझे
कहने को जब बचा ही नहीं कुछ भी पास में
महफ़िल को यूँ ही छोड़ के जाना पड़ा मुझे
इरफ़ान सीधा साधा सा इंसान है मियां
दिल मिल गया तो हाथ मिलाना पड़ा मुझे