Qaafiya Bazm-e-Adab

Apni ana ko kuch yun jalana pada mujhe

Irfan Shaikh

अपनी अना को कुछ यूं जलाना पड़ा मुझे
हस्ती को अपनी खुद ही मिटाना पड़ा मुझे

हाँ रात ने अंधेरे को जब गहरा कर लिया
तब रुख से तेरे परदा उठाना पड़ा मुझे

देखा जो तेरा हुस्न तो मदहोश हो गया
देके करेंट होश में लाना पड़ा मुझे

क्यों आंख वाले गड्ढे में गिर जाते है भला
उस अंधे को ये दृश्य दिखाना पड़ा मुझे

देकर कसम वो तेरी सनम पूछने लगा
जो था अहम वो राज बताना पड़ा मुझे

कहने को जब बचा ही नहीं कुछ भी पास में
महफ़िल को यूँ ही छोड़ के जाना पड़ा मुझे

इरफ़ान सीधा साधा सा इंसान है मियां
दिल मिल गया तो हाथ मिलाना पड़ा मुझे

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