ऐसा नहीं कि उसकी फ़क़त मुझको चाह थी
उसके भी दिल में चाह, मिरी बे-पनाह थी
गर में क़ुसूरवार तो तुम भी क़ुसूरवार
मुझ पर भी मेरे यार तुम्हारी निगाह थी
वो रुसवा हो न जाए ये बात इसलिए कहीं
मैं ही गुनाहगार था वो बेगुनाह थी
तुझको हमेशा शक ही रहा मेरे प्यार पर
वरना तो मेरे प्यार की दुनिया गवाह थी
इतने फरेब खाए मोहब्बत की राह में
फिर मैंने छोड़ दी जो मुहब्बत की राह थी
महफिल में अपना दर्द सुनाया था मैंने जब
उस्मान अकबर उसके लबों पर भी वाह थी